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रक्षा बंधन

प्रस्तावना त्यौहार मनाना पूरे मानव समाज की विशेष परम्परा रही है। वैसे तो कई देशों में कई प्रकार के त्यौहार मनाए जाते हैं।

भाई दूज कितनी सहायक

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    भाई दूज कितने सहायक है एक भाई की रक्षा करने में। इसकी जानकारी से पहले हमें यह जानना बहुत जरूरी है कि यह भाई दूज है क्या और यह क्यों मनाया जाता है? इसको मनाने के पीछे क्या मान्यता है और इसकी उपयोगिता क्या है?         भाई दूज क्या है?          भाई दूज दीपावली के बाद कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मनाया जाता है।         भाई दूज कैसे मनाया जाता है?         भाई दूज के दिन भाई अपनी बहन के घर जाता है वह उसके लिए और बहन के ससुराल वालों के लिए स्नेहवश नए वस्त्र, फल, मिठाइयां आदि लेकर जाता है। बहनें गोबर के भाई दूज बनाती हैं और उनकी पूजा अर्चना करती हैं और अपने भाई की लंबी उम्र के लिए कामना करती हैं। भाई को केक लगाती हैं उसकी आरती उतारती हैं। भाई अपनी बहन और उसके ससुराल वालों के लिए लाई गई सामग्री उन्हें भेंट करता है।           भाई दूज मनाने के पीछे की कहानी           भाई दूज मनाने के पीछे की कई कहानियों समाज में प्रचलित हैं जिनमें से एक कह...

नाग पूजा कितनी लाभदायक

नाग पूजा कितनी लाभदायक है इसको जानने से पहले यह जानना आवश्यक है कि नाग पूजा क्या है? और यह क्यों की जाती है?  नाग पूजा: -नाग पूजा नाग देवताओं को खुश करने और अपनी और अपने परिवार की रक्षा करने और समृद्धि प्राप्त करने के लिए नागों (सर्पों) की पूजा की जाती है।    नाग पूजा करने के पीछे लोगों की यह मान्यता भी है कि जो व्यक्ति नागों की पूजा करता है नाग देवताओं अर्थात् नागों के द्वारा उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाता है।  नाग पूजा कितनी लाभदायक अब हमारे सामने प्रश्न यह उठता है कि नाग पूजा बहुत लाभदायक है अर्थात् इसका क्या फायदा है?    संभावना: देखने में आता है कि जब किसी व्यक्ति को कोई सांप काट लेता है तो उसे किसी नाग देवता के मन्दिर में ले जाया जाता है और वहाँ पर नाग देवता की पूजा अर्चना की जाती है। हालांकि इसके बावजूद उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।     अब विचारणीय विषय यह है कि जब उक्त व्यक्ति पूर्व में ही नाग पूजा करता था तो इस मान्यता के साथ कि नाग देवता उसकी रक्षा करेंगे और नाग देवता अर्थात् कोई सांप उसे और उसके परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। ज...

सही शिक्षा क्या है

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सही शिक्षा क्या है? सही शिक्षा क्या है? इस बारे में जानने से पहले हमसे पहले यह जानना आवश्यक है कि शिक्षा क्या है? शिक्षा शब्द  संस्कृत भाषा की शिक्षा शिक्ष् धातु में प्रत्यय अ ’ प्रत्यय लगाने से बना है। 'शिक्ष्' का अर्थ है सीखना और सिखाना। 'शिक्षा' शब्द का अर्थ हुआ सीखने-सिखाने की क्रिया। व्यापक अर्थ में शिक्षा उसका यह सीखना-सिखाना विभिन्न समूहों, त्योहारों, पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन आदि से अनौपचारिक रूप से होता है। यही सीख-सिखाना शिक्षा के व्यापक और विस्तृत रूप में आते हैं। किसी समाज में सदैव चलने वाली सोद्देश्य सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का विकास, उसके ज्ञान और कौशल में वृद्धि और व्यवहार में परिवर्तन किया जाता है और इस प्रकार उसे सभ्य, सुसंस्कृत और योग्य नागरिक बनाया जाता है। मनुष्य क्षण-प्रतिक्षण नए-नए अनुभव प्राप्त करता है व करवाता है, जिससे उसका दिन-प्रतिदन का व्यवहार प्रभावित होता है। संकुचित अर्थ में शिक्षा: - समाज में एक निश्चित समय और निश्चित स्थानों (विद्यालय, महाविद्याल...

Buddha

महात्मा बुद्ध कौन थे? इसके बारे में आपको विस्तार से बताते हैं कि जैसा हमें जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज के सत्संग से जानकारी मिली है। महात्मा बुद्ध स्वर्ग लोक से आए हुए एक बहुत ही पुण्यकर्मी आत्मा (प्राणी) थे। महात्मा बुद्ध राजा का लड़का था। महात्मा बुद्ध ने स्वर्ग में प्राप्त सुख की खोज में घर और राज को भी त्याग दिया। परमात्मा  प्राप्ति के लिए वास्तविक आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति साधना देने वाला कोई संत उन्हें नहीं मिला। जिसके फलस्वरूप और पूर्व जन्म के संस्कार और पुण्य कर्म के आधार पर उसने मनाने ढंग से हठ योग करना शुरू कर दिया।] हठयोग द्वारा में उसने आहार भी त्याग दिया। गया (बिहार) के अंदर एक वट वृक्ष के नीचे बैठकर महीनों तक हठयोग साधना की। जिससे इनका शरीर भी अस्ती -पंजर ही शेष रह गया और मारणासन्न अवस्था में पहुंच गया।तब   एक माई (माता) ने महात्मा बुद्ध को खीर चटाई। जिससे महात्मा बुद्ध के प्राण बच गए। उसके बाद उसने पेट भर कर अन्न का आहार किया। जिसके बाद उन्होंने अपना एक सिद्धान्त बना लिया कि भूखा रहने से परमात्मा प्राप्ति नहीं हो सकती है और उसे जनता में प्रचार क...

#GodKabir_PrakatDiwas_2020 #पूर्णसंतरामपालजी

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*कबीर साहेब का प्राकट्य* ज्येष्ठ मास की शुक्ल पूर्णमासी विक्रमी संवत् 1455 (सन् 1398) सोमवार को ब्रह्म मुहूर्त में कबीर परमेश्वर जी काशी के लहरतारा तालाब पर कमल के फूल पर शिशु रूप में प्रकट हुए। इस लीला को ऋषि अष्टानन्द जी ने आंखों देखा। वहाँ से नीरू-नीमा परमेश्वर कबीर जी को अपने घर ले आये। गरीब, काशीपुरी कस्त किया, उतरे अधर उधार। मोमन कूं मुजरा हुआ, जंगल में दीदार।। स्वामी रामानंद जी ने अष्टानन्द जी से कहा, जब कोई अवतारी शक्ति पृथ्वी पर लीला करने आती है तो ऐसी घटना होती है। " *कबीर साहेब की बाल लीलाएं*" :- कबीर परमेश्वर शिशु रूप में में काशी में अवतरित हुए तो उनको देखने के लिए पूरी काशी के लोग उमड़ उमड़ कर आ रहे थे। ऐसा अद्भुत बच्चा उन्होंने आज तक नहीं देखा था। बच्चे का शरीर सफेद बर्फ की तरह चमक रहा था। बालक को देखने के लिए ऊपर से सूक्ष्म रूप में देवता भी आए। गरीब, गोद लिया मुख चूंबि कर, हेम रूप झलकंत। जगर मगर काया करै, जैसे दमकैं पदम अनंत।। काशी में जो भी बालक (कबीर परमात्मा) को देखता वही अन्य को बताता कि नूर अली को एक बालक तालाब पर मिला है आज ही उत्पन...

#कबीरपरमेश्वर_की_लीलाएं #3दिन_बाद_कबीरप्रकटदिवस

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कबीर साहेब द्वारा सर्वानंद को शरण में लेना पंडित सर्वानंद ने अपनी माँ से कहा कि मैंने सभी ऋषियों को शास्त्रार्थ में हरा दिया है तो मेरा नाम सर्वाजीत रख दो लेकिन उनकी माँ ने सर्वानंद से कहा कि पहले आप कबीर साहेब को शास्त्रार्थ में हरा दो तब आपका नाम सर्वाजीत रख दिया जाएगा। जब सर्वानंद कबीर साहेब के पास शास्त्रार्थ करने पहुँचे तो कबीर साहेब ने कहा कि आप तो वेद-शास्त्रों के ज्ञाता हैं मैं आपसे शास्त्रार्थ नहीं कर सकता। तब सर्वानंद ने एक पत्र लिखा कि शास्त्रार्थ में सर्वानंद जीते और कबीर जी हार गए। उस पर कबीर साहेब जी से अंगूठा लगवा लिया। लेकिन जैसे ही सर्वानंद अपनी माँ के पास जाते तो अक्षर बदल कर कबीर जी जीते और पंडित सर्वानंद हार गए ये हो जाते। ये देखकर सर्वानंद आश्चर्य चकित हो गए और आखिर में हार मानकर सर्वानंद ने कबीर साहेब की शरण ग्रहण की।